संपादकीय
कर्मयोगी के विचार:
वास्तव में स्वस्थ वह नहीं है जो केवल रोगमुक्त है — बल्कि वह जिसके दोष संतुलित हैं, जिसकी अग्नि प्रबल है, जिसका मन प्रसन्न है, और जो अपने स्वरूप में स्थित है।
सुश्रुत संहिता में वर्णित आयुर्वेदिक स्वास्थ्य-परिभाषा की द्विभाषी व्याख्या WHO की परिभाषा और अरस्तू से स्टोइक तक की दार्शनिक परंपराओं से तुलना सहित।

संपादकीय
कर्मयोगी के विचार:
वास्तव में स्वस्थ वह नहीं है जो केवल रोगमुक्त है — बल्कि वह जिसके दोष संतुलित हैं, जिसकी अग्नि प्रबल है, जिसका मन प्रसन्न है, और जो अपने स्वरूप में स्थित है।
श्लोक
Sushruta Samhita, Sutrasthana 15.48
समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥
समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥
हिंदी अर्थ
वह व्यक्ति स्वस्थ है जिसके दोष संतुलित हैं, जिसकी अग्नि संतुलित है, जिसकी धातुएँ और मल सामान्य रूप से कार्य करते हैं, और जिसकी आत्मा, इंद्रियाँ और मन प्रसन्न हैं — ऐसा व्यक्ति स्वस्थ कहलाता है।
सुश्रुत संहिता का यह श्लोक किसी भी चिकित्सा परंपरा में स्वास्थ्य की सबसे संक्षिप्त और पूर्ण परिभाषाओं में से एक है। यह शारीरिक, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक आयामों को एक ही मापने योग्य ढाँचे में एकीकृत करता है।
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संपादकीय दिशा के लिए प्रयुक्त संदर्भ